निश्छल भटनागर की कलम से….
सांच को आंच नहीं !
”सत्य परेशान हो सकता है, लेकिन पराजित नहीं।” कहावत से स्पष्ट है कि सच्चाई के मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति को कठिनाइयों या संघर्षों का सामना बेशक करना पड़ सकता है, लेकिन…. अंत में जीत हमेशा सत्य की ही होती है। समय बीतने पर सच्चाई खुद-ब-खुद सामने आ ही जाती है, और…. सच की राह पर चलने वाले की ही जीत होती है। कुछ ऐसा ही हुआ है अपणे हरियाणे में। हालांकि, बहुत दिन बाद हुआ है ऐसा कुछ। शायद पहले कभी भी नहीं हुआ। जो लगा हरेक को अच्छा। चर्चाओं के बाजार में छनकर आई, कहानी ईमानदारी की। कर्तव्यनिष्ठा की। निष्पाप आचरण की। बरसों बरस पहले ली गई वो शपथ….सत्य निष्ठा की। किसी और ने नहीं, खुद केंद्रीय जांच एजेंसी ….CBI ने दी है, क्लीन चिट। चर्चा तो यही है कि कोई तो साबित हुआ सच्चा। नज़ीर बना दीखता है ये मामला। जिस पर टिकी हुई हैं अनगिनत निगाहें। नौकरशाहों के बीच बन गए हैं…. रोल मॉडल। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की सरकार के दो आला अफसर…. दुष्मंत कुमार बेहेरा और मनी राम शर्मा। इन दोनों अफसरों के नाम CBI ने….सैंकड़ों करोड़ रुपए के IDFC बैंक के घोटाले मामले से…. निकाल बाहर किए हैं। इन दोनों अफसरों को घोटाले से जुड़े मामले में सेंट्रल एजेंसी ने कर दिया है….आरोप मुक्त। भ्रष्टाचार को लेकर ज़ीरो टोलेरेंस….रखने वाली हरियाणा सरकार के मुख्यमंत्री…. नायब सिंह सैनी ने विधानसभा में जो बयान दिया था, उसने…. विपक्ष का मुंह उस वक़्त ही बंद कर दिया था, जब मामले को CBI को देने का ऐलान कर दिया था। फैसला मुश्किल था, लेकिन। साख का सवाल था। नाक का सवाल था। कठिनाई बड़ी थी। चुनौती अड़ी थी। बात आन की थी। मान और शान की थी। सरकार के आत्म सम्मान की थी। दूध का दूध और पानी का पानी….कर देने की लगन लग चुकी थी। जैसा कुछ सोचा था। CBI ने किया वैसा ही कुछ। ढूंढ निकाला वो सब-कुछ। छोड़ा नहीं बाकी अब-कुछ। CBI की स्पेशल कोर्ट में दाखिल की गई….चार्ज शीट में खोल डाला सब। उगल डाला सब। कौन कहां कब किससे कितना कैसे…. क्या कुछ, सब कुछ…..।
चर्चा है कि…. पूरे प्रकरण में संयोग भी खूब बने। मसलन…. चंद ताकतवर लोग जुटे रहे। तमाम कोशिशें- कवायद….करते- करवाते रहे। मामले को अलग ही अंदाज़ में घुमाते और सुलगाते रहे। इस बीच मीडिया के कुछ स्वयंभू…. कलमतोड़ू पत्रकारों के मार्फ़त बेवजह…. ईमानदार अफसरों के नाम उछलवाते रहे। जतलाते ऐसे रहे कि….ये भी हैं शामिल। अब इनका नंबर लगने वाला है। एजेंसी इन्हें दबोचने वाली है। पकड़ने वाली है…. बताते- समझाते तो ऐसे रहे मानो…. जांच करवाने के असल सूत्रधार खुद ये ही हों। हैरानी की ही बात है कि…. हर मामले में सनसनी खोजने वाले….और अपने असल दायित्व- कर्त्तव्य से मुंह फेर चुके….चंद मीडिया कर्मियों ने…. कुछ इशारों को किय डिकोड…. और खूब नाम उछाले। मौसम विभाग की तरह खूब भविष्यवाणियां कीं…. अफवाहों पर स्टोरीज बना….खूब सुर्खियां बटोरीं, लेकिन….जब बात CBI की अग्नि परीक्षा से…. जांच प्रक्रिया से ….बेदाग़- बेक़सूर, निर्दोष- निष्कलंक निकलकर…. जांच की आंच में तपकर….कुंदन बन निकल कर आए….ईमानदार अफसरों के नामों पर आई तो…. कुछ लोगों के चेहरे उतर आए। चर्चा तो ये है कि ऐसे भी चेहरे दीख रहे हैं हैं, जो…. पचा नहीं पा रहे हैं कि ये हुआ तो…. कैसे हुआ।
चर्चा है कि….कुछ अफसर साहब से मिलने गए…. या मिलवाए गए। ऐसी खबरें आईं। मगर ये संयोग ही रहा कि …. CBI अफसरों द्वारा क्लीन चिट पाए ये दोनों अफसर उस वक़्त…. माननीय तक पहुंच ही नहीं पाए। उनसे मिल ही न पाए। चर्चा है कि बुलाए ही न गए। अब पता नहीं, किसकी क्या योजना थी। कितनी सफल या असफल रही। काम कर पाई या अब सबके सामने खुल गई। वो कहते हैं न कि…. ख़ुदा जाने। वो ही चेहरे और उन पर चढ़े नकाब पहचाने। जिसने जो किया…. सही था या गलत…. वो आया सामने। चर्चा है कि जो अफसर वहां…. दुआ-सलाम, राम राम कर आए…. वो अब तक जांच की सेंक में हैं। तप रहे हैं। तपिश झेल रहे हैं। जांच प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। अंजाम तक हौले हौले पहुंच रही है। जैसे जैसे दिन गुज़र रहे हैं…. तमाम दिलों की धुकधुकी और …. धमनियों में खून की रफ्तार बढ़ रही है। चर्चा इस बात की भी है कि…. हरियाणा के दो ईमानदार अफसरों…. दुष्मंत कुमार बेहेरा और मनी राम शर्मा ने…. ब्यूरोक्रेसी का मान सम्मान बनाए रखा है। अपनी एसोसिएशन का। अपने बड़े-बूढ़ों का। माता-पिता का, अपने गुरुजनों का….नाम रोशन किया है, जिन्होंने दी ऐसी मुकम्मल तालीम। अपनी परवरिश और संस्कारों के बूते….अपनी नेक नीयत और संतुलित-आदर्श विचार- व्यवहार से सिस्टम को बनाए-बचाए रखा। सत्य को किसी हाल में झुकने न दिया।
पडोसी सूबे के बेहद आला अफसरों के बीच….बीते दिनों ये चर्चा चली कि वर्तमान समय में…. लोग न राजनेताओं को दूध का धुला मानते हैं, न ब्यूरोक्रेट्स को। ऐसे में जिन अफसरों की ईमानदारी को सेंट्रल एजेंसीज ने किया हो सलाम…. उनके हाथों में देनी चाहिए बड़े और महत्वपूर्ण विभागों की कमान। करने चाहिए उनके कंधे मजबूत। देनी चाहिए उन्हें बड़ी ज़िम्मेवारी। बैठाना चाहिए सिर आंखों पर। बनाना चाहिए आंखों का तारा। झिलमिलाता प्यारा प्यारा। ऐसा करके सरकार को…. मिल सकता है नतीजा न्यारा न्यारा। साथ ही सरकार अपनी इमेज…. या छवि को संवार सकती है। जनता में भरोसा कायम कर सकती है। सीना तानकर बोल सकती है…. हमारे यहां भ्रष्टाचार पर है ज़ीरो टॉलरेंस….अफसरों को पोस्टिंग देते हैं हम….देखकर उनकी परफॉरमेंस। कुल मिलाकर कहानी का लब्बो लुआब ये कि…. सांच को आंच नहीं।
”गोली से नहीं साहब, गाली से लगता है डर”
वो डायलाग तो याद है ना, आपको। दबंग फिल्म का, जिसमें हीरोइन कहती है। थप्पड़ से डर नहीं लगता साहब, प्यार से लगता है। लेकिन दो सूबों की राजधानी में एक बेहद वरिष्ठ अधिकारी के घर। चल पड़ी चर्चा, कुछ ऐसी ही। ज़िक्र हुआ एक ख़ास वर्ग से ताल्लुक रखने वाले। आला पुलिस अफसर का। जिन्होंने शपथ तो ली थी बिना डर या पक्षपात के। न्यायपूर्ण आचरण करने के संकल्प की। मग़र करने लगे पक्षपात। बात बे-बात, दिखाने लगे जात। छोटे मुलाज़िमों को अपनी कोरी औकात। उनकी इस आदत से वाकिफ तो थी पूरी फ़ोर्स। और जमात। पर कभी खुलकर सामने नहीं आ पाते थे। उनकी बद्सलूकियों और तोहमतों से जुड़े जज़्बात। ख़ैर, आ गया वो मौक़ा भी। तो चर्चा चल पड़ी साहब की बिगड़ी आदतों की। बिन गाली दिए बात न करने की। शुरुवाती दिनों की, जब ढंग के कपडे भी नहीं थे। जिस्म पर उनको मयस्सर। पता नहीं किसकी दुआओं से….बन गए आल इंडिया सर्विस के अफसर। यूनिफार्म फ़ोर्स के। दौर था वो जबकि जिले का कप्तान….क्या कुछ गुल खिलाता है…. क्या करता है, गलत या सही। पता जल्दी नहीं चल पाता था। उन्हीं दिनों का एक किस्सा आया निकल। कप्तान साहब जिले की सीमा लांघ…. प्रदेश की परिधि से निकल…. पहुँच गए पड़ोसी सूबे में। और कर आए वहां…. खूब गाली गलौज। दल-बल संग किसी से झगड़ा बड़ा। जिससे झगड़े उसने बुला ली पुलिस। मामला पहुँच गया पडोसी सूबे के सम्बंधित जिले के वरिष्ठ पुलिस कप्तान के पास। फोन घुमाकर एसएसपी ने निकाल दी। इन साहब की सारी हेकड़ी। और जता दिया कि अगली बार अपने जवान लेकर घुसे जिले में। और झगड़े तो सीधे अंदर डाल दूंगा। चर्बी सारी उतार दूंगा। चर्चा है कि काफी समय तक ये साहब गए नहीं अपने पीहर।
बात यहीं खत्म नहीं हुई। चर्चा तब शबाब पर आ गई, जब किस्सा छिड़ गया दिल्ली दरबार का। बताते हैं कि इन साहब ने सरदार वल्लभ भाई पटेल नेशनल पुलिस अकादमी में दिलाई गई शपथ फिर भुला दी। अपने समाज – जमात के बेहद उच्च अधिकारी के यहां बेधड़क जा पहुंचे। साथ लिवा ले गए अपने जिले के स्वजातीय जवानों को। ब्लैक कैट कमांडो जैसा बनाकर। चर्चा है कि यूपीए सरकार में होते थे एक नेट ऐसे। जो सरनेम सुनकर पिघल जाया करते थे। अपनी पोजीशन इक पल को भूल जाया करते थे। और ”टोपी वालों” को देख कुछ भी कर गुजरने को तैयार हो जाया करते थे। उन्होंने ही एक मौके पर मुलाकात करवा दी थी। इन साहब की देश से सबसे बड़े अफसर से। उसी पहचान का मन-मुआफ़िक फायदा बटोरने…. जब तब जा पहुँचते थे ये साहब। बहरहाल, दिल्ली में किसी दूसरे सूबे की पुलिस के जवानों की…महत्वपूर्ण स्थल पर मौजूदगी से मच गई हलचल। चर्चाओं का बाजार गरमा उठा। बात निकली और जा पहुंची सूबाई डीजीपी तक। जहां विराजते थे ऐसे जांबाज़ सूरमा पुलिस अफसर। कि जिनके नाम से खाया करते थे बदमाश गश। और कांपा करते थे गैंगस्टर थर थर। तलब करवा लिया तत्कालीन डीजीपी साहब ने अपने मातहत अफसर को। अपने दरबार में। और करीने से क़तर डाले सारे पर। सूना दिया कि चलेगी नहीं यहां पर। किसी और की, ख़ास तौर से वो, जिनके पास जाया करते हो तुम अकसर। कुछ समझे। साहब की घुड़की ने किया वो काम कि इन जनाब को महीनों न मिला आराम। उस पर नज़रें लग गईं महकमे के दूसरे फसरों कि टेढ़ी मेढ़ी, सो अलग से। ख़ैर…..।
अब आते हैं….”गोली से नहीं, गाली से डर” पर। चर्चा है कि इन साहब ने दरियाफ्त की, किसी मुलाजिम को लेकर…. इधर से उधर लगाया ज़ोर बहुत। मग़र हुआ नहीं कहीं कोई असर। कहीं चल पड़ी चर्चा इसी बात की। अजीब इत्तेफ़ाक़ की। कि जो रहा इनका अपना ही हमसाया। उसको बहुत समझाया, मग़र काम कुछ न आया। बहुत पूछने पर उसने बताया। कि साहब के साथ रहे बहुत बरस। कई मर्तबा गोलियां भी चलने की नौबत आई। पर हमने पीठ कभी न दिखाई। लेकिन करें क्या तब, जब हर बात की शुरुवात हो गालियों से। छोटे मुलाजिम हैं तो क्या साहब, इज्जत तो हमारी भी है। कहीं भी भेज दीजिये। पर उस गालीबाज के पास मत भेजिए। गोली से नहीं, गाली से लगता है डर। वो भी इसलिए कि कहीं बिना बात के गाली सुनकर। छोटे मुंह बड़ी बात न हो जाए। दिल में घुमड़ रहा तूफ़ान…. फ़र्ज़ की रह में कोई बेअदबी न करवा दे। चर्चा है कि, साहब की हरकतें उन्हीं के दरज़े की हैं। उनकी तैनाती बेशक एक ही सूबे में रही हो। अपने पैरेंट काडर में, मग़र चर्चे पड़ोसी सूबे में भी खूब होते हैं। काम ही कुछ करते हैं ऐसा….कि दूसरे सूबे में भी तमाम मुलाज़िम नाम से जुड़े…. किस्से कहानियों सुनकर चटखारे लेने से नहीं चूकते हैं।
बिना आग के धुंआ….नहीं निकलता जनाब !
घर की बात घर में ही रहती तो…. बेहतर होती। मग़र बड़े बड़ों की बात….दीवार फांदकर बाहर। छलांग लगा कर कुलांचे भर चुकी है। किस्सों और कहानियों में गढ़ी जा चुकी है। चर्चा है कि बड़े दफ्तर से दूसरे ‘निजी’ को…. निज निवास भेज दिया गया है। हमेशा हमेशा के लिए। चिंताजनक बात इसलिए क्योंकि…. ये दूसरा मौक़ा है जब दूसरे ‘निजी’ को दिखाया गया है…. बाहर जाने का रास्ता। बात बहुत ऊपर तक पहुंच चुकी है और…. अब सुधार की गुंजाइश भी ख़तम…. होती दिख रही है। अभी ज्यादा दिन पुरानी बात नहीं है ये…. बड़ा नाम कमाने की ख्वाइश रखने वाले…. छोटे से व्यक्ति को रंगे हाथों धर दबोचा गया। मोटी रकम के साथ। शिकायतें पहले भी थीं, लेकिन…. चारदीवारी लांघ नहीं पाती थीं। एक सेटअप था ऐसा कि…. जानकारी मिली और मामला दिया दबा। ”नाम बड़े और दर्शन छोटे” ने खूब की रंगबाज़ी। लिखने पढ़ने की क्या बात करें…. नाम छपवाने में था उस्ताद। काम की सुपारी दी किसी को और…. चंद रोज़ में नाम सामने। किताब के ऊपर। उस्ताद इसलिए कि मौके पर लगा दिया चौका। साहब की ओट लेकर…. जलवा जलाल दिखाकर कर दी चुपके से…. जलालत भरी शरारत। यहां पकड़ाई, वहां पकड़ाई…. लिखी खुद नहीं थी, मग़र सबको पढ़वाई। देखने जानने वाले थे हैरान…. बेहद परेशान, क्योंकि…. उसकी रफ़्तार कर रही थी, सबको खबरदार। इसे धमकाना, उसे चमकाना। यहां आ जाना, वहां मत जाना। आये दिन बनाता नया बहाना। मैडम सर के कानों तक हर वक़्त….चुगली का विष पहुंचाना। कलाकारी- मास्टरी करना। काम न आया उसके…. जब हुआ दिल्ली दरबार से….अनजाने में टकराना। तय तब ही हो गया था कि…. इसे अब न छोड़ना। चर्चा है कि….छोटे उस्ताद थे आदत से मजबूर। माल पकड़ने जा रहे थे कहीं दूर। रास्ते में लिए गए धर। पहुंचा दिए गए बड़े घर…. बहुत से लोग उसे, मामा का घर भी बोलते हैं। खैर, रंग भरे हाथों की धमक ने….उतार डाली आखों पर चढ़ी ऐनक। और भारी मन से किए गए वो रूखसत। चर्चा है कि, ताजातरीन मामले में दूसरे ”निजी” भी बिदा हो लिए हैं। कुछ तो है पक रहा ऐसा क्योंकि…. बिना आग के धुआं नहीं होता जनाब। दिल्ली दरबार से जुड़े सूत्र बताते हैं कि…. बहुत हुआ सम्मान। अब गाड़ी नेक्स्ट गियर में डाली जाएगी। पटकथा लिख ली गई है। जल्द अमल में लाई जाएगी।
रेड क्रॉस में धांधलियों पर अंकुश
45 बरस में जो न हुआ, वो अब होने को है। हरियाणा रेडक्रॉस ने आंकड़े दुरुस्त करने…. मन लगाकर काम करने…. संसाधन जुटाने और अपनी सम्पत्तियों को सँभालने का अभियान छेड़ दिया है। करोड़ो अरबों रुपये कीमत की जमीनों को सहेजना शुरू कर दिया है। साथ ही अपने तकरीबन 700 मुलाजिमों को खुद वेतन देने का संकल्प ले लिया है। बता दें कि अभी तक CSR फंड से वेतन दिया जाता रहा है। चर्चा है कि जब से हरियाणा रेडक्रॉस में युवा उद्यमी अंकुश मिगलानी ने वाईस चेयरमैन का जिम्मा संभाला है। तब से ही वर्किंग में जिम्मेवारी जवाबदेही को शामिल किया गया है, जो कर्मचारियों को बेहतर काम करने की प्रेरणा दे रहा है। मिगलानी पुराने मामलों को तो निपटा ही रहे हैं…. जरूरतमंदों के हाथ थामने का कोई मौका चूक नहीं रहे। अपना पति गंवा चुकी फतेहाबाद की महिला को 17 बरस बाद बुलाकर जब उसका बनता हक़ दिया तो बोली, अब हुआ इंसाफ़। रेड क्रॉस की तस्वीर बदल गई है, जिसकी पहले कभी उम्मीद भी नहीं थी। चर्चा ये भी है कि हरियाणा में कई जिलों में रेडक्रॉस की बेशकीमती जमीनों पर भूमाफिया कि निगाहें गड़ी हुई हैं….जिन पर अंकुश ही लगा रहे हैं अंकुश। कुछ मामलों में अब तक होते रहे हैं कब्जे। जिम्मेवार अधिकारी आँखें मूंदे रहे। घर पर चैन से पड़े सोते रहे। ऐसा मामले रेड क्रॉस के जिलावार अफसरों के कानों को खुजाते रहे… मग़र मगरूर, बेपरवाह और बेदर्द मुलाजिम जान बूझकर आँख बंद किए रहे। अब मिगलानी ने कर्मचारियों की वर्किंग में जवाबदेही शामिल करके बनाया….सिस्टम को मजबूत। चर्चा है कि मुश्किल से मुश्किल समस्या का झट समाधान…. निकाल देने वाले वाईस चेयरमैन अंकुश मिगलानी को मिला हुआ है…. रेडक्रॉस चेयरमैन एवं गवर्नर प्रोफेसर आशीम कुमार घोष का आशीर्वाद। गवर्नर इसी बात से हैं प्रफुल्लित कि….45 साल में पहली बार रेडक्रॉस अपने दम पर डटा खड़ा है। मिगलानी धांधलियों को सुधारने की दिशा में अंकुश लगाने में जुटा है। करप्शन खत्म करने में जान झोंके दे रहा है। रेडक्रॉस की जमीनों पर चल रही दुकानों से किराया वसूल रहा है। लीगल मामलों से निपटने को अपनी लीगल टीम बना रहा है। अच्छे काम करने को वो है तलबगार…. जरूरत है सपोर्ट की, जिसके लिए सिस्टम ही तत्पर।
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