हरियाणा में मलेरिया, डेंगू और अन्य वेक्टर-बोर्न बीमारियों को रोकने के लिए सख्त नियम नोटिफ़ाईड : डॉ. सुमिता मिश्रा

न्यूज़म ब्यूरो 

चंडीगढ़, 13 फरवरी :  राज्य सरकार ने मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया और जापानी इंसेफेलाइटिस जैसे रोगों की रोकथाम के लिए हरियाणा महामारी अधिनियम संशोधन 2024 को नोटिफ़ाई किया है। अब बदले हुए नियमों का उल्लंघन करने वालों पर सज़ा का प्रावधान किया गया है।

यह जानकारी देते हुए अतिरिक्त मुख्य सचिव स्वास्थ्य विभाग डॉ. सुमिता मिश्रा ने कहा कि मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया और जापानी इंसेफेलाइटिस के फैलने से लगातार बढते हुए खतरे के मद्देनजर महामारी एक्ट, 1897 के सेक्शन 2 के तहत नोटिफ़िकेशन जारी किया गया है। ये नियम तुरंत प्रभाव से लागू हो गए और 31 मार्च, 2027 तक प्रभावी रहेंगे।

नए नियमों के तहत सभी सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों, क्लीनिकों एवं लैबोरेटरी को अब वेक्टर-बोर्न बीमारियों के प्रत्येक कन्फर्म केस की रिपोर्ट पता चलने के 24 घंटे के अंदर रोगी की पूरी जानकारी संबंधित सिविल सर्जन को देना अनिवार्य है। रियल टाईम मॉनिटरिंग और कोऑर्डिनेटर रिस्पॉन्स कन्फर्म की जानकारी को इंटीग्रेटेड हेल्थ इंफॉर्मेशन प्लेटफॉर्म पोर्टल पर भी अपडेट किया जाना चाहिए। डॉ. मिश्रा ने बल दिया कि आउटब्रेक को रोकने और जटिल मौतों को कम करने तथा समय पर जन स्वास्थ्य हस्तक्षेप को मुमकिन बनाने के लिए तुरंत नोटिफिकेशन आवश्यक है।

नोटिफिकेशन में सख्त डायग्नोस्टिक प्रोटोकॉल बनाए गए हैं। मलेरिया का केस माइक्रोस्कोपी या एंटीजन और बेस्ड रैपिड डायग्नोस्टिक टेस्ट से कन्फर्म होने के बाद ही पॉजिटिव बताया जा सकता है तथा भारत सरकार की ड्रग पॉलिसी के अनुसार पूरा मेडिकल ट्रीटमेंट दिया जाना चाहिए। इसी प्रकार डेंगू के केस की पुष्टि सिर्फ एलिसा बेस्ड एनएस 1 एलजीएम या आरटी एवं पीसीआर टेस्ट से ही की जा सकती है। एनएसआई एंटीजन टेस्ट उन मरीज़ों का किया जाना है जिन्हें पाँच दिन से कम बुखार रहा हो, जबकि एलजीएम एंटीबॉडी टेस्ट उन लोगों के लिए ज़रूरी है जिन्हें पाँच दिन से ज़्यादा बुखार रहा हो। किसी भी मरीज़ को कन्फर्म टेस्ट किए बिना डेंगू पॉज़िटिव घोषित नहीं किया जा सकता। 

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सरकार द्वारा बीमारी फैलने पर मरीज़ों को ज़्यादा मेडिकल चार्ज से बचाने के लिए डेंगू टेस्ट की कीमत निर्धारित कर दी गई है। प्राइवेट अस्पतालों और लैब को एलिसा बेस्ड एनएस 1 और एलजीएम टेस्ट के लिए 600 रुपये से ज़्यादा चार्ज करने की अनुमति नहीं है। इसके अलावा प्राइवेट अस्पतालों को निर्देश दिये गये हैं कि अगर आवश्यकता हो, तो वे सिंगल डोनर प्लेटलेट्स के लिए हर मरीज़ से 11,000 रुपये से ज़्यादा चार्ज न करें। जिन मामलों में प्राइवेट लैब में एलिस टेस्टिंग की सुविधा नहीं है, उन्हें मरीज़ों को कन्फर्मेशन के लिए निर्धारित सरकारी लैब में भेजना होगा या उनके ब्लड सैंपल भेजने होंगे।

यह नियम निदेशक स्वास्थ्य सेवाएं या सिविल सर्जन द्वारा नियुक्त किए गए निरीक्षण अधिकारी को निगरानी, एंटी-लार्वल उपायों, फॉगिंग या स्प्रे करने के लिए किसी भी परिसर में प्रवेश का अधिकार भी देते हैं। इनमें अधिकारियों को शक वाले मरीज़ों को जांच के लिए ब्लड सैंपल देने और इलाज करने के निर्देश देने का भी अधिकार है। ये अधिकारी मच्छरों को पनपने से रोकने के लिए आवश्यकता अनुसार कीटनाशक छिड़कने और ठहरे हुए पानी के स्रोतों के उपचार का भी आदेश दे सकते हैं।

उन्होंने कहा कि जो अस्पताल या लैब स्वीकृत डायग्नोस्टिक प्रोटोकॉल या नियमों का पालन नहीं करते, कन्फर्म मामलों की रिपोर्ट नहीं देते, बिना कन्फर्मेशन टेस्टिंग के मामलों को घोषित करते हैं, या मरीज़ की अधूरी जानकारी देते हैं तो उन पर जुर्माना लगाया जाएगा। पहली बार नियम का उल्लंघन करने पर 1,000 रुपये, दूसरी बार नियम तोड़ने पर 5,000 रुपये और तीसरी या उसके बाद नियम तोड़ने पर 10,000 रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा। लगातार नियम न मानने पर महामारी अधिनियम 1897 की धारा 3 के तहत कार्रवाई की जा सकती है। किसी भी जुर्माने के खिलाफ 30 दिनों के अंदर सिविल सर्जन की अध्यक्षता वाली अपीलेट कमेटी के समक्ष अपील की जा सकती है।

डॉ. सुमिता मिश्रा ने कहा कि इन नियमों का उद्वेश्य मामलों का जल्द पता लगाने, डायग्नोसिस स्टैंडर्ड अपनाने एवं इलाज पक्का करने, रिपोर्टिंग में पारदर्शिता बढ़ाने और बीमारी फैलने के दौरान मरीज़ों का शोषण रोकना है। उन्होंने कहा कि नियमों को सख्ती से लागू करने से हरियाणा में वेक्टर-जनित बीमारियों के मौसमी प्रकोप से निपटने की तैयारी और रिस्पोंस में सुधार होने के साथ लोगों के स्वास्थ्य की भी सुरक्षा होगी।

 

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